पहले एक simple सवाल मान लो तुम एक खेल खेल रहे हो। खेल शुरू होने से पहले किसी ने तुम्हें…
मान लो तुम एक खेल खेल रहे हो। खेल शुरू होने से पहले किसी ने तुम्हें एक jersey पहना दी — लाल रंग की। तुमने वो jersey नहीं चुनी, बस पहना दी गई। अब खेल में तुम naturally लाल team के लिए चिल्लाने लगते हो, नीली team को automatically दुश्मन मानने लगते हो।
यही जाति, धर्म और देश के साथ होता है। Jersey थमा दी जाती है — जन्म लेते ही।
सवाल यह नहीं कि jersey बुरी है। सवाल यह है — क्या तुमने कभी रुककर पूछा: यह jersey मुझे suit करती है? क्या मैं इसे choose करता, अगर मेरे पास choice होती?
तुम्हारी जाति, तुम्हारा धर्म, तुम्हारा देश — इनमें से एक भी तुमने नहीं चुना। यह कोई insult नहीं है, यह simply एक fact है।
दार्शनिक John Rawls ने 1971 में एक thought experiment दिया — “Veil of Ignorance.” कल्पना करो कि तुम दुनिया में आने से पहले decide करते हो कि समाज कैसा होना चाहिए — लेकिन तुम्हें नहीं पता कि तुम किस जाति में, किस देश में, किस परिवार में पैदा होगे। ऐसे में तुम कैसा समाज चाहोगे?
ज़्यादातर लोगों का honest जवाब होगा: ऐसा जहाँ जन्म नहीं, काम से इज़्ज़त मिले। यानी जब हम खुद से honest होते हैं, तो हम जानते हैं कि जन्म से मिली चीज़ों पर गर्व की कोई logical नींव नहीं है।